श्रेष्ठ मनुष्य की पहचान

 

 

एक राजा ने सोचा कि उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली है। प्रजा और राज दरबारी उसकी प्रशंसा करते हैं। क्या वह सचमुच श्रेष्ठ है, इसका पता लगाना चाहिए। इस संदर्भ में राजा ने विद्वानों, मंत्रियों और सेनापति से पूछा। उन्होंने कहा, 'महाराज, आपका चरित्र तो चंद्रमा के समान धवल है।' राजा ने सोचा, जा नहीं करती, मैं प्रशंसनीय नहीं हो सकता। उन्होंने प्रजा से पूछा। कइयों ने कहा,'आप में कोई त्रुटि नहीं है।' राजा ने सोचा- शायद भय के कारण प्रजा ने प्रशंसा की हो। अतः सच जानने हेतु मुझे बाहर निकलना चाहिए।

 

राजा रथ पर बैठकर बाहर निकल गए। वह गांव-गांव जाकर पूछने लगे। सभी जगह से यही उत्तर मिला कि राजा में कोई अवगुण नहीं है। राजा का रथ आगे बढ़ रहा था, उधर दूसरी ओर

राजा ब्रम्हादत्त बोले, "पानी से गन्दगी साफ़ कर सकते हैं लेकिन गंदगी से गंदगी को साफ़ नहीं कर सकते" अर्थात "श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो बुराई करने वालों के साथ भी भलाई करे।"

 

यह सुन राजा मलिक के ज्ञान चक्षु खुल गए। उन्होंने ब्रह्मदत्त को मार्ग दे दिया और स्वयं विचार किया कि उसने खुद को श्रेष्ठ होने के लिए नहीं बल्कि योग्य होने के प्रयास करना चाहिए जिससे गुण और श्रेष्ठता अपने आप आ जाएगी ।


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